BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने करीब 45 साल पुराने फर्जी वेतन आहरण मामले में अहम फैसला सुनाते हुए तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. आर.के. सेन सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जबकि इस मामले में अभियोजन पक्ष ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा।

यह मामला अविभाजित मध्य प्रदेश के दौर का है, जब वर्ष 1979 से 1985 के बीच जगदलपुर स्थित स्वास्थ्य विभाग में कथित रूप से फर्जी वेतन आहरण का आरोप लगा था। आरोप था कि डॉ. सेन और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों ने मिलीभगत कर तीन सफाई कर्मचारियों—जयसिंह, लालमणि और मयाराम—के नाम पर फर्जी वेतन बिल बनाकर करीब 42 हजार रुपये की सरकारी राशि का गबन किया।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
इस मामले में जगदलपुर की विशेष अदालत ने 28 जनवरी 2002 को आरोपियों को दोषी करार देते हुए आईपीसी की विभिन्न धाराओं (420, 467, 468, 471, 120-बी) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दो-दो साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की थी।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
अपील पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में कई गंभीर खामियां थीं दस्तावेजों के हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान फर्जी होने का कोई फोरेंसिक प्रमाण नहीं दिया गया। कई रिकॉर्ड केवल कार्बन कॉपी के रूप में प्रस्तुत किए गए, मूल दस्तावेज अदालत में नहीं लाए गए। कर्मचारियों के खिलाफ स्वतंत्र आपराधिक मंशा साबित नहीं हुई, वे वरिष्ठों के निर्देशों का पालन कर रहे थे। संबंधित कर्मचारियों ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि वे काम पर अनुपस्थित थे; कई ने वेतन मिलने और हस्ताक्षर करने की बात स्वीकार की।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा कि आपराधिक साजिश साबित करने के लिए ठोस और स्पष्ट प्रमाण जरूरी होता है। संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया, जिससे उन्हें बड़ी राहत मिली है।





































