BILASPUR NEWS. नक्सल हमले में गंभीर रूप से घायल हो चुके सुरक्षाकर्मियों की तैनाती को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे जवानों को उनकी शारीरिक स्थिति को नजरअंदाज कर दोबारा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पोस्ट करना न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि उनकी सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है।

मामला सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के आरक्षक दिनेश ओगरे से जुड़ा है, जो छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल की दूसरी बटालियन में पदस्थ थे। वर्ष 2016 में बीजापुर के पामेड़ क्षेत्र में नक्सली हमले के दौरान उनके सिर में गोली लगी थी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। लंबे इलाज के बाद वे ड्यूटी पर लौटे, लेकिन 2018 में फिर ड्यूटी के दौरान उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया।

इन परिस्थितियों के बावजूद पुलिस मुख्यालय द्वारा उन्हें दोबारा अति-नक्सल प्रभावित बीजापुर के अदवाड़ा कैंप में तैनात करने का आदेश जारी किया गया, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि पुलिस महानिदेशक द्वारा 3 सितंबर 2016 और 18 मार्च 2021 को जारी सर्कुलर में स्पष्ट निर्देश हैं कि नक्सल हमलों में घायल जवानों से उनकी क्षमता के अनुसार ही कार्य लिया जाए और उन्हें संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात न किया जाए। इसके बावजूद विभाग ने नियमों की अनदेखी की।

कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक घायल जवान को फिर से जोखिम भरे इलाके में भेजना अनुचित है। साथ ही ऐसे मामलों में जवानों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के निर्देश दिए।

इस फैसले को सुरक्षाकर्मियों के हित में एक महत्वपूर्ण और मानवीय कदम माना जा रहा ।




































