BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पुलिस कार्यप्रणाली और मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर एक अहम और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने दुर्ग जिले में एक होटल संचालक को बिना किसी ठोस कानूनी आधार और बिना FIR के जेल भेजे जाने को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य सरकार को पीड़ित को 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि सरकार चाहे तो यह राशि दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है।

भिलाई के अवंतीबाई चौक निवासी आकाश कुमार साहू (30 वर्ष), जो कि कानून के छात्र हैं, कोहका क्षेत्र में होटल का संचालन करते हैं। 8 सितंबर 2025 को पुलिस टीम एक गुमशुदा लड़की की तलाश के नाम पर उनके होटल पहुंची थी। आकाश साहू का आरोप है कि पुलिस ने बिना महिला पुलिसकर्मियों के होटल के उन कमरों में जबरन प्रवेश किया, जहां महिलाएं ठहरी हुई थीं। विरोध करने पर पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी की और उन्हें जबरन हिरासत में ले लिया। पुलिस ने आकाश साहू पर सरकारी कार्य में बाधा और शांति भंग करने का आरोप लगाते हुए BNS की धारा 170 के तहत कार्रवाई की और बिना किसी वैध FIR के उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की बेंच ने पुलिस के साथ-साथ SDM की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की महज संदेह और कहासुनी के आधार पर किसी व्यक्ति को जेल भेजना संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि SDM को न्यायिक प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने बिना समुचित विचार किए पुलिस रिपोर्ट पर मुहर लगा दी। कोर्ट ने यह भी माना कि हिरासत के दौरान दिया गया मानसिक तनाव और अपमान मानवीय गरिमा का हनन है।

कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में कारण बताना कानूनन अनिवार्य है, जिसका इस मामले में पूरी तरह से पालन नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने आकाश साहू के खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया है। साथ ही आदेश दिया कि राज्य सरकार 4 सप्ताह के भीतर 1 लाख रुपये का मुआवजा दे। जांच के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों से यह राशि वसूलने की स्वतंत्रता सरकार को होगी। इस फैसले को पुलिस जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।




































