BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को परेशान करने या उस पर दबाव बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि डोमेस्टिक इंसीडेंट रिपोर्ट में ठोस तथ्य न हों और उसे केवल वैवाहिक विवाद या बच्चों की कस्टडी के लिए हथियार बनाया जाए, तो ऐसी कार्यवाही कानून का दुरुपयोग है।

उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी प्रकाश सिंह और उनकी दो बहनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सूरजपुर की निचली अदालत में चल रही घरेलू हिंसा की कार्यवाही को चुनौती दी थी। पति का तर्क पत्नी अपने बड़े बेटे को अपनी निसंतान बहन को गोद देना चाहती थी। पति के इनकार करने पर उसने घर छोड़ दिया और दबाव बनाने के लिए पति व ससुराल वालों पर कई अदालतों में केस दर्ज करा दिए।
पति का आरोप था कि यह सब बच्चों की कस्टडी हासिल करने के लिए किया गया। पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही उसे दहेज और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने बड़े बेटे को जबरन अपने पास रख लिया है।

हाईकोर्ट का अहम फैसला और टिप्पणी
हाईकोर्ट ने पाया कि 19 अक्टूबर 2022 को तैयार की गई डोमेस्टिक इंसीडेंट रिपोर्ट में हिंसा की किसी भी विशिष्ट घटना का जिक्र नहीं था। रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं था कि प्रताड़ना कब, कहां और किसने की। केवल दहेज की मांग या मानसिक प्रताड़ना जैसे अस्पष्ट शब्दों के आधार पर गंभीर कानूनी कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि यह संरक्षण अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वह रिपोर्ट में सभी आवश्यक तथ्य दर्ज करे। तथ्यों के बिना रिपोर्ट पूरी कार्यवाही को कमजोर बनाती है।

घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 9(1)(b) के तहत यह रिपोर्ट एक अनिवार्य दस्तावेज है जिसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। इसमें हिंसा का समय, स्थान, आरोपी की स्पष्ट पहचान और क्रूरता का स्वरूप स्पष्ट होना चाहिए। कोर्ट ने इन आधारों पर पति और उसकी बहनों के खिलाफ चल रही निचली अदालत की कार्यवाही को निरस्त कर दिया है।




































