BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने वैवाहिक रिश्तों और तलाक के मामलों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि क्रूरता की परिभाषा केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। यदि कोई जीवनसाथी दूसरे के करियर, स्वास्थ्य या सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाता है, तो उसे मानसिक क्रूरता माना जाएगा और यह तलाक का ठोस आधार होगा।

मामला दुर्ग जिले के एक दंपत्ति का है, जिनका विवाह 30 मार्च 2019 को हुआ था। पत्नी का आरोप था कि शादी के बाद से ही पति और ससुराल पक्ष उसे दहेज के लिए मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगे। पति ने ₹1 लाख की मांग की थी, जिसे पत्नी ने अपनी नौकरी से किस्तों में चुकाया। इसके बावजूद प्रताड़ना कम नहीं हुई, जिससे तंग आकर पत्नी मई 2020 में अपने मायके लौट गई।
फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका
पत्नी ने दुर्ग के फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी लगाई थी। हालांकि, साल 2022 में फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि पत्नी के पास प्रताड़ना के पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इसके बाद पत्नी ने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान पाया कि पति ने खुद स्वीकार किया था कि उसने पत्नी को वापस लाने का कोई प्रयास नहीं किया और उसके द्वारा भेजे गए कानूनी नोटिस को भी फाड़ दिया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कहा क्रूरता केवल मारपीट नहीं है। मानसिक उत्पीड़न, उपेक्षा, असहयोग और ऐसा व्यवहार जिससे साथी के करियर या मानसिक संतुलन पर विपरीत प्रभाव पड़े, वह वैवाहिक क्रूरता है। जब कोई रिश्ता केवल विवाद, तनाव और मुकदमेबाजी का कारण बन जाए, तो उसे खींचना दोनों पक्षों के हित में नहीं होता। ऐसे मामलों में भविष्य और सम्मान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने दुर्ग फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को निरस्त करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली और उसे तलाक का हकदार माना। अदालत के इस फैसले को उन कामकाजी महिलाओं के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है जो ससुराल में मानसिक उत्पीड़न और करियर में बाधाओं का सामना करती हैं।




































