BILASPUR NEWS. करीब दो दशक पुराने दुष्कर्म के एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी युवक को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि महिला बालिग है और उसके साथ आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बने हैं, तो हर मामले में इसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

2000 का मामला, 2005 में हुई थी सजा
मामला सरगुजा जिले के धौरपुर थाना क्षेत्र का है। वर्ष 2000 में एक युवती ने लीना राम ध्रुव नामक युवक पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया था। शिकायत के अनुसार दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई, जो बाद में प्रेम संबंध में बदल गई। युवती का आरोप था कि युवक ने शादी का वादा कर उसके साथ कई वर्षों तक संबंध बनाए और बाद में शादी से मुकर गया। मामले की सुनवाई के बाद अंबिकापुर के जिला एवं सत्र न्यायालय ने वर्ष 2005 में आरोपी को दुष्कर्म का दोषी मानते हुए 7 साल के कारावास और 5 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट में चुनौती
निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एन.के. व्यास की एकल पीठ ने साक्ष्यों और परिस्थितियों का पुनर्मूल्यांकन किया।

कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि घटना के समय महिला बालिग थी और अपने निर्णयों के परिणाम समझने में सक्षम थी। अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी की शुरुआत से ही शादी करने की कोई मंशा नहीं थी या उसने धोखे से संबंध बनाए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शादी का वादा कर संबंध बनाना हर परिस्थिति में दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।





































