BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने टोनही प्रताड़ना से जुड़े एक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपियों को मिली दोषमुक्ति को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी का स्पष्ट और संतोषजनक कारण होना आवश्यक है। देरी और गवाहों के बयानों में विरोधाभास के चलते मामला संदेहास्पद हो गया, इसलिए सत्र न्यायालय का फैसला सही माना गया। यह आदेश जस्टिस संजय एस. अग्रवाल की एकलपीठ ने पारित किया। कोर्ट ने पीड़िता की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के दोषमुक्ति के आदेश को यथावत रखा।

मामला बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के शंकरगढ़ थाना क्षेत्र का है। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि 8 अगस्त 2012 को गांव के रामलाल यादव और उसकी पत्नी फूलकुमारी उसके घर पहुंचे और उसे ‘टोनही’ कहकर अपमानित किया। आरोप था कि दोनों ने महिला के साथ गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी दी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और 506 (भाग-2) के साथ ही छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 की धारा 4 और 5 के तहत मामला दर्ज किया था।

अदालतों में चला लंबा कानूनी सफर
मामले में पहले राजपुर के प्रथम श्रेणी न्यायालय ने 28 मार्च 2019 को दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपियों ने इस फैसले को सत्र न्यायालय बलरामपुर में चुनौती दी।
सत्र न्यायालय ने 14 सितंबर 2021 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए साक्ष्यों के अभाव में दोनों आरोपियों को बरी कर दिया। इसके खिलाफ पीड़िता ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट को क्यों लगा मामला संदिग्ध
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि घटना 8 अगस्त 2012 की बताई गई, जबकि एफआईआर 26 अगस्त को दर्ज कराई गई। यानी शिकायत दर्ज कराने में 18 दिन की देरी हुई, जिसका कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके अलावा पीड़िता और उसके पति के बयानों में भी कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विरोधाभास पाया गया। दोनों ने एसपी कार्यालय जाने की बात कही, लेकिन इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि शिकायतकर्ता के पति और आरोपी रामलाल यादव के बीच पहले से जमीन विवाद चल रहा था, जिससे झूठी शिकायत की आशंका को भी बल मिला।

कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एफआईआर दर्ज कराने में अनावश्यक देरी और गवाहों के बयानों में विरोधाभास के कारण मामला संदेहास्पद हो जाता है। ऐसे मामलों में ठोस कारण और विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी है। इन्हीं आधारों पर अदालत ने सत्र न्यायालय के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपियों की दोषमुक्ति को बरकरार रखा।




































