BILASPUR NEWS. कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सार्वजनिक उपक्रमों को स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी अधिकारी को केवल प्रशासनिक लापरवाही के नाम पर तब तक दंडित नहीं किया जा सकता, जब तक उस कार्य की जिम्मेदारी उसे औपचारिक रूप से सौंपी न गई हो। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड द्वारा अपने लेखा अधिकारी के खिलाफ की गई दंडात्मक कार्रवाई को पूरी तरह रद्द कर दिया।

यह मामला SECL में पदस्थ लेखा अधिकारी रजनीश कुमार गौतम से जुड़ा है, जिन पर पूर्व सैनिकों की एजेंसियों से जुड़े कोयला लोडिंग और परिवहन बिलों की बकाया राशि वसूल न कर पाने का आरोप लगाकर उन्हें एक वर्ष के लिए डिमोशन और इंक्रीमेंट रोकने जैसी कठोर सजा दी गई थी। कोर्ट ने इस पूरे मामले को प्रशासनिक लापरवाही और जिम्मेदारी तय किए बिना की गई कार्रवाई करार दिया।
दस्तावेजों ने खोली प्रबंधन की पोल
जस्टिस ए.के. प्रसाद की सिंगल बेंच ने रिकॉर्ड की जांच में पाया कि संबंधित बिलों की ऑडिट, स्वीकृति और वसूली की जिम्मेदारी पहले से ही क्षेत्रीय वित्त विभाग को दी गई थी। याचिकाकर्ता की भूमिका केवल औपचारिक रिकॉर्ड प्रक्रिया तक सीमित थी। बावजूद इसके, उन्हें वित्तीय नुकसान का जिम्मेदार ठहराया गया।

हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्देश
कोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा वैधानिक नियमों और प्रशासनिक निर्देशों की अनदेखी को गंभीर त्रुटि मानते हुए आदेश दिया कि लेखा अधिकारी पर लगाया गया दंड तत्काल समाप्त किया जाए। तीन महीने के भीतर वेतन, रोका गया इंक्रीमेंट और अन्य बकाया का भुगतान किया जाए।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी साफ कर दिया कि कर्मचारियों को स्केपगोट बनाकर प्रबंधन अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकता। यह फैसला न केवल SECL बल्कि सभी सरकारी व सार्वजनिक उपक्रमों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी और नजीर माना जा रहा है।



































