BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से प्रेम और कानून के टकराव का एक अनोखा मामला सामने आया है। देवरीखुर्द निवासी एक युवक द्वारा अपनी बांग्लादेशी पत्नी और बच्चे को नारी निकेतन से मुक्त कराने के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला और बच्चे को सजा के तौर पर नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा और देखभाल के लिए संस्थान में रखा गया है।

क्या है मामला
जानकारी के अनुसार, देवरीखुर्द का एक ब्राह्मण युवक कुछ समय पूर्व बांग्लादेश में रह रहा था। वहीं उसकी मुलाकात एक मुस्लिम युवती से हुई और दोनों के बीच प्रेम संबंध स्थापित हो गया। अलग-अलग धर्म और युवती के परिजनों के विरोध के चलते दोनों बांग्लादेश से भागकर बिलासपुर आ गए। यहां आकर दोनों ने मंदिर में विवाह कर साथ रहना शुरू कर दिया।

वर्ष 2025 में मिली एक शिकायत के आधार पर पुलिस ने युवक के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज कर उसे जेल भेज दिया। चूंकि युवती बांग्लादेश की नागरिक है और उसके पास भारत में रहने के वैध दस्तावेज या कोई स्थानीय अभिभावक नहीं था, इसलिए प्रशासन ने उसे सुरक्षा की दृष्टि से रायपुर स्थित नारी निकेतन में भेज दिया। उस दौरान युवती गर्भवती थी और वहीं उसने एक पुत्र को जन्म दिया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
जेल से रिहा होने के बाद युवक ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर अपनी पत्नी और बच्चे को अवैध हिरासत से मुक्त कर उसके सुपुर्द करने की मांग की। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा महिला और बच्चे को संस्थान में सजा के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षात्मक हिरासत में रखा गया है। महिला भारत में बिना वैध दस्तावेज और बिना किसी कानूनी गार्जियन के रह रही थी, ऐसे में उसे वेलफेयर संस्थान में रखना गैर-कानूनी नहीं है।

महिला के खिलाफ डिपोर्टेशन (देश निकाला) की प्रक्रिया लंबित है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी करने का आधार नहीं बनता। अदालत ने इन टिप्पणियों के साथ युवक की याचिका खारिज कर दी।





































