BILASPUR NEWS. शहर की आग से सुरक्षा व्यवस्था बीते पांच वर्षों से केवल कागजों के भरोसे चलती रही। नए फायर स्टेशन के नाम पर फाइलें घूमती रहीं, बैठकें होती रहीं और जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे। नतीजा यह हुआ कि शहर की सुरक्षा व्यवस्था खुद जोखिम क्षेत्र में पहुंच गई। अब जाकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सख्त दखल के बाद प्रशासन हरकत में आया है और निर्माण के लिए वर्क ऑर्डर जारी किया गया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि अब केवल कागजी औपचारिकताएं नहीं, बल्कि जमीनी काम देखा जाएगा।

वर्ष 2020 में फायर स्टेशन को मंजूरी मिल चुकी थी, लेकिन इसके बाद प्रशासन जमीन की तलाश में ही उलझा रहा। सकरी रोड, कोनी जैसे इलाकों पर चर्चा होती रही, प्रस्ताव बनते-बिगड़ते रहे और करीब ढाई साल सिर्फ लोकेशन तय करने में निकल गए। इस दौरान शहर में आगजनी की घटनाएं होती रहीं, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठे। कुदुदंड में जमीन फाइनल होने के बाद सामने आया कि भूमि दलदली है। सामान्य नींव संभव नहीं थी और राफ्ट फाउंडेशन तकनीक अपनानी पड़ी। यह तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि पहले से जांच न करने की चूक थी, जिसके चलते संशोधित एस्टीमेट और मंजूरी में दो साल और जाया हो गए।

चेकलिस्ट नहीं भेजी, टेंडर रद्द हुआ
प्रशासनिक लापरवाही का सबसे चौंकाने वाला पहलू तब सामने आया जब यह स्वीकार किया गया कि एसई कार्यालय से समय पर चेकलिस्ट नहीं भेजी गई, जिसके कारण पूरा टेंडर ही रद्द करना पड़ा। इस एक चूक ने शहर की सुरक्षा को और लंबा इंतजार करने पर मजबूर कर दिया।

कोर्ट ने लिया संज्ञान
मोपका स्थित विद्युत सब-स्टेशन और आसपास की दुकानों में लगी भीषण आग के बाद मामला सुर्खियों में आया। मीडिया रिपोर्ट्स को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और इसे जनहित का विषय मानते हुए सुनवाई शुरू की। इसके बाद ही प्रशासन की वर्षों से जमी फाइलें अचानक तेज़ी से चलने लगीं।

अस्थायी फायर स्टेशन, स्थायी खतरा
वर्तमान में शहर एक अस्थायी फायर स्टेशन के सहारे है, जहां संसाधनों और स्टाफ की भारी कमी है। पुराने वाहनों और सीमित जल क्षमता के साथ किसी बड़ी आग से निपटना लगभग असंभव है।
हाईकोर्ट की दखल से भले ही फायर स्टेशन का रास्ता साफ हुआ हो, लेकिन यह मामला प्रशासनिक तंत्र की उस लापरवाही को भी उजागर करता है, जिसकी कीमत शहरवासियों को वर्षों तक असुरक्षा के रूप में चुकानी पड़ी।


































