BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी भर्तियों को लेकर एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए यह साफ कर दिया है कि नियमों के उल्लंघन पर समय की कोई वैधता नहीं होती। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में पिछले 14 वर्षों से पदस्थ 70 सब-इंजीनियर्स की नियुक्तियां अवैध करार देते हुए कोर्ट ने उन्हें तत्काल सेवा से मुक्त करने के आदेश दिए हैं। यह फैसला केवल कर्मचारियों के भविष्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी भर्ती प्रक्रिया, चयन समितियों और प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।

विवाद की जड़ वर्ष 2011 में जारी वह विज्ञापन है, जिसमें सब-इंजीनियर (सिविल) के 275 पदों के लिए भर्ती निकाली गई थी। भर्ती नियमों में स्पष्ट था कि आवेदन की अंतिम तिथि 23 मार्च 2011 तक अभ्यर्थी के पास आवश्यक डिग्री या डिप्लोमा होना अनिवार्य है लेकिन चयन प्रक्रिया के दौरान न केवल पदों की संख्या बढ़ाई गई, बल्कि कट-ऑफ डेट के बाद डिग्री प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को भी नियुक्त कर दिया गया। कुल 383 नियुक्तियां कर दी गईं, जो नियमों के सीधे उल्लंघन में थीं। इस अनियमितता को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता रवि तिवारी ने हाईकोर्ट का रुख किया। याचिका में आरोप लगाया गया कि चयन नियमों की अनदेखी कर अपात्रों को लाभ पहुंचाया गया। योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन हुआ । भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव रहा लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने दस्तावेजों और रिकॉर्ड की गहन जांच कर फैसला सुरक्षित रखा, जिसे अब सुनाया गया है।

हाईकोर्ट की दो टूक टिप्पणी
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा रिक्रूटमेंट रूल्स सर्वोपरि हैं। खेल शुरू होने के बाद उसके नियम नहीं बदले जा सकते। अगर नियुक्ति की नींव ही अवैध है, तो उसे लंबी सेवा वैध नहीं बना सकती। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यह मामला सार्वजनिक पद से जुड़ा है और ऐसे पद पर किसी अयोग्य व्यक्ति को बने रहने का अधिकार नहीं है।
किस पर चला कोर्ट का डंडा
-प्राइवेट रिस्पॉन्डेंट नंबर 4 से 73 तक की नियुक्तियां रद्द।
-इन 70 सब-इंजीनियर्स को तत्काल पद छोड़ने का निर्देश।
-वर्षा दुबे और अभिषेक भारद्वाज को राहत, क्योंकि वे कट-ऑफ डेट से पहले योग्य पाए गए हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि गलती केवल कर्मचारियों की नहीं थी।

वेतन की वसूली क्यों नहीं?
अदालत ने कहा कि भर्ती में चूक शासन और चयन अधिकारियों की भी रही। कर्मचारियों ने काम किया, सेवाएं दीं, इसलिए 14 वर्षों में दिए गए वेतन और भत्तों की रिकवरी नहीं की जाएगी। यह टिप्पणी प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी तय करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
फैसले के दूरगामी असर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद प्रदेश की अन्य पुरानी भर्तियों पर भी कानूनी निगाह जाएगी। चयन समितियों की जवाबदेही तय करने की मांग तेज होगी। भविष्य में कट-ऑफ डेट और पात्रता नियमों में ढील देना मुश्किल होगा। बैकडोर एंट्री” पर लगाम कसने का रास्ता खुलेगा।


































