BILASPUR NEWS. गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी (GGU) प्रबंधन और 109 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के बीच पिछले 16 वर्षों से चल रही कानूनी लड़ाई का अंततः कर्मचारियों की जीत के साथ अंत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी प्रबंधन को करारा झटका देते हुए उनकी अंतिम उम्मीद यानी ‘क्यूरेटिव पिटीशन’ को भी खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद अब यूनिवर्सिटी के पास बचने का कोई कानूनी रास्ता नहीं बचा है और उन्हें हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार कर्मचारियों को नियमित करते हुए सभी पुराने बकाये का भुगतान करना होगा।

क्या था पूरा मामला?
यह विवाद 2008 से जुड़ा है। छत्तीसगढ़ शासन के आदेश पर 26 अगस्त 2008 को यूनिवर्सिटी के 109 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित किया गया था। जनवरी 2009 में जब यूनिवर्सिटी को ‘सेंट्रल यूनिवर्सिटी’ का दर्जा मिला, तो ये कर्मचारी भी इसका हिस्सा बन गए। उन्हें मार्च 2009 तक नियमित वेतन (8,209 रुपये) भी मिला। लेकिन, अप्रैल 2009 में यूनिवर्सिटी ने बिना किसी पूर्व सूचना के उनका वेतन वापस ले लिया और उन्हें फिर से कलेक्टर दर पर भुगतान शुरू कर दिया। हद तो तब हो गई जब 19 फरवरी 2010 को एक आदेश जारी कर 2008 के नियमितीकरण को ही रद्द कर दिया गया।

अदालत में हारता गया यूनिवर्सिटी प्रबंधन
कर्मचारियों ने डॉ. अरुण सिंगरौल के नेतृत्व में इस अन्याय के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
- हाईकोर्ट सिंगल बेंच: 6 मार्च 2023 को कोर्ट ने 2010 के आदेश को निरस्त करते हुए कर्मचारियों को नियमित माना।
- हाईकोर्ट डिवीजन बेंच: यूनिवर्सिटी ने अपील की, लेकिन 21 जून 2023 को डिवीजन बेंच ने भी फैसला कर्मचारियों के पक्ष में सुनाया।
- सुप्रीम कोर्ट: प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (SLP) दायर की, जो 15 मई 2024 को खारिज हो गई। इसके बाद रिव्यू पिटीशन और अब अंत में क्यूरेटिव पिटीशन भी खारिज हो चुकी है।

संघर्ष के दौरान कई साथी छोड़ गए साथ
16 साल की इस लंबी कानूनी लड़ाई की कीमत कर्मचारियों को भारी चुकानी पड़ी है। अपने हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते कई कर्मचारियों की मौत हो गई, जबकि कई बिना नियमित हुए ही रिटायर हो गए। अब सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम फैसले के बाद उम्मीद जागी है कि दिवंगत कर्मचारियों के परिजनों और रिटायर हो चुके लोगों को उनका वाजिब हक और एरियर्स मिल सकेगा।

अवमानना का नोटिस जारी
अदालती आदेशों के बावजूद नियमितीकरण न करने पर हाईकोर्ट में अवमानना याचिका भी लगाई गई थी, जिस पर कुलपति, कुलसचिव और एमएचआरडी सचिव को नोटिस जारी किया गया है। अब सुप्रीम कोर्ट से अंतिम मुहर लगने के बाद प्रबंधन को तत्काल प्रभाव से आदेश का पालन करना होगा।




































