BILASPUR NEWS. बच्चों की परवरिश सिर्फ सुविधाओं और पैसों से नहीं होती, बल्कि स्नेह, सुरक्षा और भावनात्मक स्थिरता से होती है। इसी सोच को मजबूत करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक मामले में बड़ा और मानवीय फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि बेहतर आर्थिक स्थिति होने मात्र से कोई पिता बच्चे की कस्टडी का अधिकारी नहीं बन जाता।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि सौतेली मां से बच्चे को वही ममता और अपनापन मिलेगा, इसकी कोई कानूनी या नैतिक गारंटी नहीं दी जा सकती।

पैसों से नहीं तय होता बचपन
मामला बेमेतरा जिले के कोड़वा निवासी लक्ष्मीकांत से जुड़ा है। पति-पत्नी के विवाद के बाद पिता ने अपने 7 वर्षीय बेटे की कस्टडी की मांग की थी। पिता का तर्क था कि वह आर्थिक रूप से सक्षम है, जबकि मां के पास आय का स्थायी साधन नहीं है।
अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि बच्चे का बचपन सिर्फ सुविधाओं से नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा से संवरता है। न्यायालय के अनुसार, कस्टडी तय करते समय माता-पिता के अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का भविष्य और मानसिक संतुलन प्राथमिक होना चाहिए।

बिना तलाक दूसरा रिश्ता बना बाधा
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पिता बिना तलाक लिए दूसरी महिला के साथ रह रहा है और उससे मंदिर में विवाह भी कर चुका है। इस पर अदालत ने कहा कि ऐसा पारिवारिक माहौल बच्चे के मानसिक विकास के लिए अनुकूल नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि मां के पास पल रहा बच्चा जिस अपनापन और स्थिरता के साथ बड़ा हो रहा है, वही माहौल सौतेली मां के साथ सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने दी समाज को बड़ी सीख
फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा मां का प्यार किसी भी आर्थिक संपन्नता से बड़ा होता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए बच्चे को मां की कस्टडी में रखने का निर्णय बरकरार रखा।


































