BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई पैतृक अधिकार या विरासत में मिलने वाला पद नहीं है, बल्कि यह परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से उबारने के लिए दी जाने वाली एक ‘तात्कालिक सहायता’ है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने 21 साल पुराने मामले में दायर एक याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इतने लंबे समय बाद नियुक्ति की मांग करना नीति और कानून दोनों के विरुद्ध है।

दरअसल, रायगढ़ जिले के घरघोड़ा क्षेत्र के निवासी निजेश चौहान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। निजेश के पिता शिक्षा विभाग में मंडल संयोजक के पद पर कार्यरत थे, जिनका 19 फरवरी 2005 को निधन हो गया था। पिता की मृत्यु के समय निजेश नाबालिग था।
देरी की वजह: दो पत्नियों का विवाद
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसके पिता की दो पत्नियां थीं, जिसके कारण अनुकंपा नियुक्ति को लेकर परिवार में विवाद शुरू हो गया। मामला सिविल कोर्ट पहुँचा, जहाँ लंबे समय बाद आपसी समझौते के जरिए विवाद सुलझाया गया। इसी पारिवारिक कलह और कानूनी प्रक्रिया के कारण विभाग में आवेदन करने में काफी देरी हुई।

14 साल बाद विभाग ने किया था दावा नामंजूर
शिक्षा विभाग ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता ने वयस्क होने के बाद साल 2019 में (पिता की मृत्यु के लगभग 14 साल बाद) आवेदन किया था। विभाग ने देरी को आधार मानकर आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर मामले पर पुनर्विचार किया गया, लेकिन 16 जनवरी 2023 को विभाग ने फिर से इसे देरी के आधार पर नामंजूर कर दिया था।

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को उस कठिन समय में राहत देना है, न कि वर्षों बाद रोजगार उपलब्ध कराना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दो पत्नियों के बीच विवाद या नाबालिग होने का तर्क नीति में तय समय सीमा को बढ़ाने का आधार नहीं हो सकता। इतने सालों बाद किया गया दावा उस ‘तात्कालिक राहत’ के सिद्धांत को खत्म कर देता है जिस पर यह नीति टिकी है। इन्हीं टिप्पणियों के साथ माननीय न्यायालय ने निजेश चौहान की याचिका को खारिज कर दिया।




































