BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद के एक मामले में ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिना किसी ठोस सबूत के जीवनसाथी पर अवैध संबंधों का आरोप लगाना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस एके प्रसाद की बेंच ने इसी आधार पर एक डॉक्टर पति की तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली है।

मामला सारंगढ़ निवासी एक डॉक्टर का है, जिनका विवाह साल 2008 में भिलाई की रहने वाली एक महिला डॉक्टर से हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। पति का आरोप था कि पत्नी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करती थी, मांग में सिंदूर और मंगलसूत्र पहनने से इनकार करती थी और उस पर लगातार चरित्रहीन होने के झूठे आरोप लगाती थी।
फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दी थी अर्जी
पति ने पहले दुर्ग के फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए आवेदन किया था, लेकिन कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान पता चला कि पत्नी ने लिखित बयान में पति का संबंध एक अन्य महिला डॉक्टर से होने का गंभीर आरोप लगाया था, जिसे वह साबित नहीं कर पाई।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा एक शिक्षित पत्नी द्वारा पति पर बिना आधार के अवैध संबंधों का आरोप लगाना क्रूरता का सबसे वीभत्स रूप है। पत्नी पति के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने में नाकाम रही, जिससे पति को भारी मानसिक वेदना झेलनी पड़ी। कोर्ट ने पाया कि अप्रैल 2019 में दोनों साथ में फिल्म देखने गए थे, इसलिए केवल अलग रहने (Desertion) के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता था, लेकिन ‘क्रूरता’ के आधार पर तलाक जायज है।

25 लाख रुपये गुजारा भत्ता का आदेश
अदालत ने तलाक की डिक्री मंजूर करते हुए पति को आदेश दिया है कि वह अपनी पत्नी को 25 लाख रुपये का एकमुश्त गुजारा भत्ता दे। चूंकि दोनों ही पेशे से डॉक्टर हैं और आर्थिक रूप से सक्षम हैं, फिर भी बेटी की परवरिश और भविष्य की कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए कोर्ट ने यह राशि 6 महीने के भीतर देने का निर्देश दिया है।




































