NEW DLEHI NEWS. मध्य-पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है। अमेरिका और इजराइल के साथ उसके टकराव ने दुनिया का ध्यान इस क्षेत्र की भू-राजनीति पर खींच दिया है। इसी बीच हमलों में ईरान के कुछ ऐतिहासिक स्थलों को नुकसान पहुंचने की खबरों ने उसकी प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को भी चर्चा में ला दिया है। दरअसल ईरान केवल एक आधुनिक राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक का उत्तराधिकारी माना जाता है। हजारों वर्षों में यहां शक्तिशाली साम्राज्यों का उदय और पतन हुआ, धर्म और सत्ता की संरचना बदली और अंततः आधुनिक इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई।

विस्तार से पढ़िए ईरान तक का इतिहास
प्राचीन फारसी साम्राज्य
आज जिसे ईरान कहा जाता है, उसे प्राचीन काल में फारस के नाम से जाना जाता था। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में आकेमेनिड साम्राज्य की स्थापना हुई, जिसे प्राचीन विश्व के सबसे बड़े साम्राज्यों में गिना जाता है। इस साम्राज्य का विस्तार एशिया, यूरोप और अफ्रीका तक था। इतिहासकारों के अनुसार इसी दौर में फारसी शासकों का प्रभाव सिंधु घाटी क्षेत्र तक पहुंचा। प्रशासनिक व्यवस्था, कर प्रणाली और लंबी सड़कों का नेटवर्क विकसित करने के कारण इसे एक अत्यंत संगठित शासन व्यवस्था माना जाता है।

सासानी साम्राज्य और सांस्कृतिक प्रभाव
तीसरी से सातवीं शताब्दी के बीच सासानी साम्राज्य ईरान की प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा। इस समय फारसी संस्कृति, कला और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में फैल गया। इस काल में जोरास्ट्रियन धर्म राज्य का प्रमुख धर्म था। सासानी काल को फारसी सांस्कृतिक पहचान के स्वर्णकालों में से एक माना जाता है।

इस्लाम का आगमन
सातवीं शताब्दी में अरब मुस्लिम सेनाओं के आक्रमण के बाद ईरान में इस्लाम का प्रसार हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे ईरानी समाज और राजनीति में इस्लामी प्रभाव बढ़ता गया। हालांकि धार्मिक परिवर्तन के बावजूद फारसी भाषा, साहित्य और कला की परंपरा जारी रही और बाद के समय में इसका प्रभाव पूरे इस्लामी जगत में दिखाई दिया।
आधुनिक ईरान और 1979 की क्रांति
20वीं सदी तक ईरान पर पहलवी वंश का शासन था। 1979 में एक बड़े जन आंदोलन के बाद ईरानी इस्लामी क्रांति हुई, जिसने राजशाही को समाप्त कर दिया। क्रांति के बाद धार्मिक नेता आयतुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी के नेतृत्व में देश को इस्लामी गणराज्य घोषित किया गया। इसके बाद से ईरान की शासन व्यवस्था में धार्मिक नेतृत्व और निर्वाचित संस्थाओं का मिश्रण देखने को मिलता है।

वर्तमान संघर्ष और उसका महत्व
हाल के वर्षों में ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच तनाव लगातार बढ़ता रहा है। क्षेत्रीय सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम और मध्य-पूर्व की राजनीति इस टकराव के प्रमुख कारणों में गिने जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, कूटनीति और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी गहरा प्रभाव डाल सकता है।

3000 वर्ष पुराने हैं भारत-ईरान के रिश्ते
भारत और ईरान के संबंध करीब 3000 वर्ष पुराने माने जाते हैं। प्राचीन काल से दोनों के बीच व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क रहा, जबकि मध्यकाल में फारसी भाषा कई भारतीय दरबारों की प्रशासनिक भाषा बनी। 15 मार्च 1950 को दोनों देशों के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए। 1990-2000 के दशक में ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा सहयोग से रिश्ते मजबूत हुए। 2016 में चाबहार पोर्ट समझौते से रणनीतिक साझेदारी बढ़ी। हालांकि 2018-2020 में अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण तेल आयात घटा और संबंधों में ठहराव आया। 2024 के बाद चाबहार परियोजना व क्षेत्रीय व्यापार के चलते रिश्तों में फिर मजबूती देखी गई।


































