INDORE NEWS. इंदौर के कोचिंग हब में पढ़ रहे छात्रों में तनाव का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे हर साल सुसाइड करने वाले छात्रों की संख्या में इजाफा हो रहा है। विशेषकर NEET और JEE की तैयारी कर रहे छात्र इस तनाव के सबसे बड़े शिकार हैं।

आत्महत्या की बढ़ती संख्या से सरकार में चिंता
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 15 हजार से अधिक बच्चों ने आत्महत्या की है। इस लिस्ट में महाराष्ट्र पहले नंबर पर है। दूसरे नंबर पर मध्यप्रदेश है, जहां 1668 मामले दर्ज किए गए थे। इसमें भी इंदौर जिले में यह आंकड़ा प्रदेश का सबसे अधिक है, जबकि दूसरे नंबर पर भोपाल है।
सरकार ने बनाई स्टेट टास्क फोर्स
बढ़ते मानसिक तनाव को देखते हुए प्रदेश सरकार ने स्टेट टास्क फोर्स (एसटीएफ) का गठन किया है। इस टास्क फोर्स में स्कूल, मेडिकल, तकनीकी शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, सामाजिक न्याय समेत विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि शामिल हैं।
यह बल विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों व कोचिंग संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की निगरानी करेगा। कॉलेजों में नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं और काउंसलिंग कार्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं।

इंदौर है प्रदेश का कोचिंग हब
इंदौर में 5000 से अधिक कोचिंग संस्थान हैं, जहां प्रदेशभर से तैयारी करने के लिए छात्र आते हैं। यहां 200 से ज्यादा नीट, जेईई और आईआईटी की तैयारी की कोचिंग हैं। भंवरकुआं, गीताभवन, पलासिया, विजय नगर जैसे इलाकों में ये संस्थान बड़े पैमाने पर फैले हैं।

माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका अहम
इंदौर में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने और सहायता प्रदान करने की जरूरत अब पहले से कहीं अधिक है। साथ ही, शैक्षणिक संस्थानों और प्रशासन को मिलकर इस चुनौती से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
विशेषज्ञ बताते हैं कि माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों से ज्यादा उम्मीदें न रखें, बल्कि उन्हें सहारा दें। बच्चों के व्यवहार में बदलाव, जैसे अकेलापन, नींद न आना, बार-बार उदासी या पढ़ाई में रुचि कम होना, ये संकेत हो सकते हैं कि बच्चों को मानसिक मदद की जरूरत है। इन संकेतों को नजरअंदाज न करें और विशेषज्ञों की सलाह जरूर लें।

तनाव के प्रमुख लक्षण पहचानें
लगातार उदास रहना, नींद या भूख संबंधी समस्याएं होना।
बच्चे का अकेला रहना या सामाजिक दूरी बनाए रखना।
पढ़ाई और पसंदीदा गतिविधियों में उसी रुचि कम होना।
बार-बार थकान महसूस करना या जीने की इच्छा न रहना।
बच्चे का छोटी-छोटी बातों पर घबराना या डर महसूस करना।
































