NEW DELHI NEWS. आधार और यूपीआई के बाद अब केंद्र सरकार देश के हर घर और स्थान की डिजिटल पहचान बनाने की तैयारी में है। इसके लिए एक नया डिजिटल एड्रेस फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, इसके तहत हर घर या लोकशन को यूनिक कोड मिलेगा। अगले एक हफ्ते में इसका ड्राफ्ट फ्रेमवर्क सार्वजनिक चर्चा के लिए जारी किया जा सकता है। जबकि, संसद के शीतकालीन सत्र में इसके लिए कानून लाने की भी तैयारी है। डिपार्टमेंट ऑफ पोस्ट्स इस काम को आगे बढ़ा रहा है और प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर नजर रख रहा है।

बताया जा रहा है कि ‘डिजिटल एड्रेस सिस्टम’ के तहत डिजिटल पोस्टल इंडेक्स नंबर यानी डिजीपिन जारी होगा। यह एक 10 कैरेक्टर का अल्फान्यूमेरिक कोड होगा, जो किसी स्थान के सटीक जियोस्पेशल कोऑर्डिनेट्स पर आधारित होगा। इससे खासतौर पर ग्रामीण इलाकों, जंगलों या अनियमित पते वाले क्षेत्रों में सेवा वितरण आसान हो जाएगा। ‘डिजिटल एड्रेस’ का एक ड्राफ्ट तैयार किया गया है, जिसमें ‘एड्रेसिंग स्टैंडर्ड’ भी शामिल हैं। इसे जल्द ही लोगों के सामने रखा जाएगा ताकि वे इस पर अपनी राय दे सकें।
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दरअसल, केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में एक कानून भी ला सकती है, इससे एक डिजिटल एड्रेस-DPI अथॉरिटी या मैकेनिज्म बनाया जा सकेगा। यह अथॉरिटी नए एड्रेस सिस्टम को लागू करेगी और इस पर नजर रखेगी। इसके अलावा, भारत में ‘खराब एड्रेस’ सिस्टम भी एक चिंता का विषय है। कई बार एड्रेस अधूरा होता है या गलत तरीके से लिखा होता है। इसमें लैंडमार्क का इस्तेमाल किया जाता है, जो डिजिटल सिस्टम के लिए ठीक नहीं है। इससे सेवाएं देने में दिक्कत होती है।

केंद्र सरकार के सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, गलत या अधूरे एड्रेस की वजह से देश को हर साल लगभग 10-14 बिलियन का नुकसान होता है, जो GDP का लगभग 0.5% है। इस समस्या को देखते हुए सरकार ने दिसंबर 2023 में नेशनल जिओस्पेशियल पॉलिसी के तहत ‘एड्रेस’ पर एक वर्किंग ग्रुप बनाया था। इस ग्रुप का काम ‘एड्रेसिंग स्टैंडर्ड’ बनाना था।

दरअसल, इसकी जरूरत इसलिए क्योंकि हर डिजिटल कंपनी, चाहे वह ई-कॉमर्स हो या डिलीवरी सर्विस, यूजर्स का एड्रेस इन्फॉर्मेशन मांगती है और उसे सेव करती है। कई बार तो यह जानकारी दूसरी कंपनियों को भी दे दी जाती है या उससे पैसे कमाए जाते हैं, और यूजर को पता भी नहीं चलता।

इसलिए सरकार चाहती है कि एड्रेस के इस्तेमाल के लिए नियम बनाए जाएं और यूजर की सहमति के बाद ही उसका एड्रेस इस्तेमाल किया जाए। सरकार एक ऐसा नियम बनाएगी जिसमें लोगों को सबसे पहले रखा जाएगा। इसमें यह भी बताया जाएगा कि सरकारी कंपनियों के साथ डेटा कैसे शेयर किया जाएगा।




































