BALOD NEWS. हिन्दू धर्म देवी-देवताओं की पूजा का विशेष महत्व होता है। प्रत्येक देवी-देवता के पूजा के पीछे भी कई सारी मान्यता होती है। इस धर्म में प्रकृति से लेकर पशु-पक्षी हर किसी को पूजते हैं। किसी भी पशु का मंदिर हो ऐसा देखने को नहीं मिलता है। लेकिन बालोद जिले में एक ऐसा मंदिर है जहां पर देवी-देवताओं की नहीं बल्कि कुत्ते की पूजा होती है। इस मंदिर से जुड़े इतिहास की कहानी नागवंशी काल से जुड़ी हुई है।
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बता दें, चैत्र नवरात्रि का पर्व चल रहा है। ऐसे में देवी मंदिरों में विशेष पूजन किया जा रहा है। वहीं जिला बालोद में देवी मंदिर तो है लेकिन यहां पर एक प्राचीन मंदिर है। जहां पर कुत्ते की पूजा की जाती है। कुकुर देव मंदिर के नाम से जाना जाता है। कुकुर देव मंदिर एक स्मारक है।
इसे खास तौर पर वफादार कुत्ते की याद में बनाया गया था। लोग आज इसकी पूजा करते है। यहां पर चैत्र नवरात्रि में अखंड ज्योत भी प्रज्ज्वलित किया गया है। इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था वफादार कुत्ते की याद भी दिलाता है। यह मंदिर पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।
कुत्ते से जुड़ी हर बीमार से मिलती है मुक्ति
स्थानीय लोगों के मुताबिक इस मंदिर कुत्ता काटने से जो बीमारी फैलती है उसका इलाज होता है दूर-दूर से लोग यहां पर आते हैं और कुत्ते की वफादारी को सलाम करते हैं और कुकुर देव भगवान के साथ यहां पर कई सारे देवी देवताओं के मंदिर समूह स्थापित है पूरे छत्तीसगढ़ सहित देश भर के लोग यहां पर दीपक भी जलते हैं दोनों नवरात्र में और महाशिवरात्रि में यहां पर विशेष पूजा अर्चना किया जाता है।
मंदिर का इतिहास
पुरातत्व विभाग के कर्मचारी महेश राम साहू ने बताया कि सदियों पहले एक बंजारा अपने परिवार के साथ इस गांव में आया था। उसके साथ एक कुत्ता भी था। गांव में एक बार अकाल पड़ गया तो बंजारे ने गांव के साहूकार से कर्ज लिया, लेकिन वो कर्ज वो वापस नहीं कर पाया।
ऐसे में उसने अपना वफादार कुत्ता साहूकार के पास गिरवी रख दिया।कहते हैं कि एक बार साहूकार के यहां चोरी हो गई। चोरों ने सारा माल जमीन के नीचे गाड़ दिया और सोचा कि बाद में उसे निकाल लेंगे, लेकिन कुत्ते को उस लूटे हुए माल के बारे में पता चल गया और वो साहूकार को वहां तक ले गया।
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कुत्ते की बताई जगह पर साहूकार ने गड्ढा खोदा तो उसे अपना सारा माल मिल गया कुत्ते की वफादारी से खुश होकर साहूकार ने उसे आजाद कर देने का फैसला लिया। इसके लिए उसने बंजारे के नाम एक चिट्ठी लिखी और कुत्ते के गले में लटकाकार उसे उसके मालिक के पास भेज दिया। इधर कुत्ता जैसे ही बंजारे के पास पहुंचा, उसे लगा कि वो साहूकार के पास से भागकर आया है। इसलिए उसने गुस्से में आकर कुत्ते को पीट-पीटकर मार डाला।
हालांकि बाद में बंजारे ने कुत्ते के गले में लटकी साहूकार की चिट्ठी पढ़ी तो वो हैरान हो गया। उसे अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। उसके बाद उसने उसी जगह कुत्ते को दफना दिया और उस पर स्मारक बनवा दिया। स्मारक को बाद में लोगों ने मंदिर का रूप दे दिया, जिसे आज लोग कुकुर मंदिर के नाम से जानते हैं।