DHAMTARI. मां अंगारमोती का मंदिर, सामने जमीन पर कतार में तीन सौ महिलाएं पेट के बल लेटी हैं। और फिर मंदिर का मुख्य पुजारी यानी बैगा उनकी पीठ पर चलते हुए मंदिर में प्रवेश कर रहे हैं। ये सभी महिलाएं नि:संतान थीं, जिन्होंने संतान प्राप्ति की आस में ऐसा खतरा मोल लिया। यहां मान्यता है कि यदि महिलाएं हाथों में नारियल, नींबू और फूल लेकर जमीन पर लेट जाएं और उनकी पीठ पर चलते हुए बैगा मंदिर में प्रवेश करे तो मां का आशीर्वाद मिलता है और उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।
दरअसल, दीपावली के बाद पूरे अंचल में मड़ई-मेले का आयोजन शुरू हो जाता है। अभी गंगरेल बांध के तट पर स्थित अंगारमोती माई के मंदिर परिसर व सामने स्थित मैदान में भी इसकी शुरुआत हुई है। इसी के तहत शुक्रवार को यहां आयोजन किया गया। इसी दिन को लेकर मान्यता है कि मां अंगारमोती के आशीर्वाद से बैगा ईश्वर नेताम पर उनका वास हो जाता है। ऐसे में वे यदि अपने पैरों से किसी भी महिला की पीठ पर पैर रखें तो उस महिला के गर्भवती होने की संभावना बढ़ जाती है। यह परंपरा और अवधारणा यहां काफी पहले से है। हर साल इसी आस में महिलाएं और उनके परिजन यहां पहुंचते हैं। इस शुक्रवार को भी यह अनुष्ठान होना था, जिसके लिए एक दिन पहले से ही महिलाएं मंदिर पहुंचने लगी थीं।

अनुष्ठान की शुरुआत शुक्रवार की सुबह पौने पांच बजे से होनी थी। इससे पहले ही मां के दरबार के बाहर प्रवेश द्वार से शुरू कर चार सौ मीटर के फासले में ये तीन सौ महिलाएं एक कतार में पेट के बल लेट गईं। सभी के हाथों में नारियल, नींबू और फूल रखे हुए थे। इसके बाद बैगा ईश्वर नेताम ने उनकी पीठ पर चलना शुरू किया, शुरुआत से लेकर मंदिर के प्रवेशद्वार तक एक-एक महिला की पीठ पर चलते हुए उन्होंने मंदिर में प्रवेश किया। इसके बाद उपस्थित श्रद्धालुओं ने मां अंगारमोती के जयकारे लगाए और अनुष्ठान संपन्न कराया गया। खास बात ये थी कि इन महिलाओं में से कई पढ़ी-लिखी भी थीं, लेकिन संतान की आस में उन्होंने भी इस तरह का खतरा मोल लिया। मान्यता ये भी है कि जो महिला पैरों से कुचली जाती हैं उन्हें मां का आशीष मिलने की संभावना अधिक होती है।
पुरानी है परंपरा, डूबान में आने से बदली जगह
मड़ई मेले का आयोजन और यह अनुष्ठान यहां पर प्राचीन समय से होता आ रहा है। स्थानीय जानकारों का कहना है कि पहले यह चंवर गांव में होता था। बाद में यहां पर गंगरेल बांध का निर्माण किया गया, तो पूरा गांव और आसपास का क्षेत्र बांध के डूबान में आ गया। तब इसकी जगह अंगारमोती मंदिर ने ले ली। इसके बाद से यानी साल 1978 के बाद से यहीं पर यह परंपरा निभाई जा रही है।
52 गांवाें से आते हैं बैगा, उमड़ती है भीड़
इस मंदिर में मड़ई मेला और यहां का अनुष्ठान दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आसपास के 52 गांवों से बैगा यहां के विभिन्न अनुष्ठानों में शामिल होने के लिए पहुंचते हैं। इस शुक्रवार को भी इतनी ही संख्या में बैगा यहां पहुंचे थे। इसके साथ ही हजारों की भीड़ भी जुटी। इन बैगाओं ने मंदिर के सामने हाथ में त्रिशूल, कासल, सांकल लेकर अपनी संस्कृति का प्रदर्शन किया। साथ ही मेला स्थल का तीन बार चक्कर लगाया और फिर मां अंगार मोती के दरबार में पहुंचे। उनके पीछे 50 से अधिक युवा 35 फीट तक लंबी डांग को लेकर दौड़ते हुए देवी का स्मरण करते हुए चले।





































