BILASPUR NEWS. वैवाहिक विवाद में दर्ज कराई गई झूठी और दुर्भावनापूर्ण शिकायत को गंभीर मानसिक उत्पीड़न मानते हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पति को तलाक की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने कहा कि पति और उसके परिजनों को सजा दिलाने के उद्देश्य से निराधार आरोप लगाना वैवाहिक जीवन में क्रूरता की श्रेणी में आता है। धमतरी निवासी दंपती का विवाह 28 अप्रैल 2009 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। शादी के बाद वर्ष 2010 और 2014 में उनके दो बच्चे हुए।

अप्रैल 2017 में पत्नी ने पति, उसके भाई और सास के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत अपराध पंजीबद्ध कर चालान पेश किया। सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में पति और उसके परिवार को बरी कर दिया। इस निर्णय के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी दायर की।

इन घटनाओं के बाद पति ने मानसिक क्रूरता के आधार पर धमतरी के परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी लगाई। परिवार न्यायालय ने आवेदन खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील की। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए माना कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप निराधार और मानहानिकारक थे।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सास के खिलाफ अशोभनीय आरोप लगाना, बरी होने के बाद भी लगातार अपील करना और पति को जेल भिजवाने के प्रयास करना मानसिक क्रूरता का प्रमाण है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार यदि जीवनसाथी झूठे आरोप लगाकर दूसरे पक्ष को सामाजिक और पेशेवर रूप से नुकसान पहुंचाने का प्रयास करता है, तो यह क्रूरता मानी जाएगी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए विवाह संबंध समाप्त करने का आदेश दिया और उसे तलाक का हकदार ठहराया।


































