LUCKNOW NEWS. उत्तर प्रदेश में अब दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और अन्य कई मामलों में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने इस संबंध में सभी जिलों के पुलिस अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिए हैं। नए निर्देश के अनुसार, ऐसे मामलों में पहले शिकायत दर्ज की जाएगी और अदालत के आदेश के बाद ही एफआईआर की कार्रवाई आगे बढ़ेगी।

डीजीपी के मुताबिक, जिन मामलों में कानून के तहत केवल परिवाद (कम्प्लेंट केस) का प्रावधान है, उनमें सीधे एफआईआर दर्ज करना नियमों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि कई बार पुलिस बिना कानूनी आधार के एफआईआर दर्ज कर लेती है, जिससे बाद में अदालत में केस कमजोर पड़ जाता है और आरोपियों को इसका लाभ मिल जाता है। इसे गंभीर प्रक्रिया संबंधी त्रुटि मानते हुए अब सख्ती से नियमों का पालन करने के निर्देश दिए गए हैं।

यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट लखनऊ बेंच की टिप्पणी के बाद लिया गया है। अदालत ने 25 फरवरी को अनिरुद्ध तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 219 के अनुसार, भारतीय न्याय संहिता की धारा 81 से 84 के तहत आने वाले मामलों में तब तक संज्ञान नहीं लिया जा सकता, जब तक पीड़ित की ओर से विधिवत शिकायत न की जाए।

इसके बावजूद पुलिस द्वारा सीधे एफआईआर दर्ज करना कानून के अनुरूप नहीं है। नए निर्देश के दायरे में दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, मानहानि, चेक बाउंस, उपभोक्ता संरक्षण, माइंस एंड मिनरल एक्ट और पशु क्रूरता से जुड़े मामलों सहित कुल 31 प्रकार के प्रकरण शामिल हैं, जिनमें केवल अदालत में परिवाद दाखिल करने का प्रावधान है।

डीजीपी ने सभी थाना प्रभारियों और विवेचकों को निर्देशित किया है कि वे संबंधित कानूनों का गंभीरता से अध्ययन करें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज करने से पहले उसका कानूनी आधार स्पष्ट हो।

इस बदलाव के बाद आम लोगों को इन मामलों में पहले अदालत का रुख करना होगा, जिसके बाद ही पुलिस कार्रवाई आगे बढ़ेगी। हालांकि, इससे कानूनी प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और मजबूत होने की उम्मीद जताई जा रही है।




































