Chhattisgarh High Court : बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को अपने निजी आवास में शांतिपूर्ण तरीके से प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए पहले से किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए पुलिस द्वारा जारी नोटिसों को निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ताओं को अनावश्यक परेशानी से बचाने के निर्देश दिए।

मामले में याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर थाना नवागढ़ (जिला जांजगीर-चांपा) द्वारा जारी नोटिसों को चुनौती दी थी। साथ ही 7 दिसंबर 2025 के आदेश को रद्द करने और अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा की मांग की गई थी।

Chhattisgarh High Court : याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल ग्राम गोधन, तहसील एवं थाना नवागढ़ में अपने मकानों के वैध स्वामी हैं। दोनों याचिकाकर्ता रिश्तेदार हैं और उन्होंने अपने घर की पहली मंजिल पर बने हॉल में वर्ष 2016 से ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित की हैं। अधिवक्ता ने कहा कि इन सभाओं में कोई अवैध गतिविधि या शांति भंग नहीं होता, फिर भी थाना प्रभारी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 94 के तहत बार-बार नोटिस जारी कर सभाओं पर रोक लगाने का प्रयास किया। ग्राम पंचायत द्वारा पहले जारी ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ को भी दबाव में वापस ले लिया गया।

राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं और वे जेल भी जा चुके हैं। साथ ही प्रार्थना सभा के लिए सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए पुलिस ने नोटिस जारी किए। राज्य ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा।

Chhattisgarh High Court : दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता 2016 से अपने निजी मकान में प्रार्थना सभा आयोजित कर रहे हैं और ऐसा करने पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि सभा के दौरान शोर-शराबा, कानून-व्यवस्था की समस्या या कोई उल्लंघन होता है तो संबंधित प्राधिकरण विधि के अनुसार कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन केवल प्रार्थना सभा आयोजित करने के आधार पर हस्तक्षेप उचित नहीं है।

Chhattisgarh High Court :
कोर्ट ने पुलिस को सख्त निर्देश दिए कि वे याचिकाकर्ताओं के नागरिक एवं धार्मिक अधिकारों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें और जांच के नाम पर उन्हें परेशान न करें। साथ ही 18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और 1 फरवरी 2026 को जारी सभी नोटिसों को निरस्त कर दिया गया।



































