BILASPUR NEWS. आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में सजा पाए एक पति को लगभग 18 साल बाद बड़ी राहत मिली है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया। जस्टिस रजनी दुबे की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए आरोपी की स्पष्ट मंशा और आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष उकसावे के ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं। जांजगीर जिले के ग्राम लिंबाथा निवासी बसंत कुमार की पत्नी टिकैतिन बाई ने विवाह के करीब चार वर्ष बाद शराब के साथ जहर सेवन कर आत्महत्या कर ली थी।

मृतका के परिजनों ने आरोप लगाया था कि बसंत बेरोजगार था और पत्नी के चरित्र पर संदेह करते हुए उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता था। इस मामले में 31 जुलाई 2007 को द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, जांजगीर की अदालत ने बसंत कुमार को धारा 306 के तहत दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील में पति की ओर से तर्क दिया गया कि दंपती के बीच केवल सामान्य वैवाहिक विवाद थे और किसी प्रकार की क्रूरता या प्रताड़ना सिद्ध नहीं हुई।

अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि आत्महत्या सीधे तौर पर आरोपी के उकसावे का परिणाम थी। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि मात्र वैवाहिक तनाव या विवाद को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। रिकॉर्ड के अनुसार घटना से पूर्व पति-पत्नी के बीच विवाद सुलझाने के लिए ग्राम पंचायत में समझौता भी हुआ था, जिससे यह संकेत मिलता है कि दोनों साथ रहने का प्रयास कर रहे थे।

हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Jaideep Singh v. State of Gujarat सहित अन्य मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए स्पष्ट आपराधिक मंशा और प्रत्यक्ष उकसावे का प्रमाण अनिवार्य है। केवल आरोप या सामान्य विवाद पर्याप्त नहीं हैं। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने निचली अदालत का फैसला निरस्त करते हुए आरोपी पति को दोषमुक्त कर दिया।


































