भक्ति के सूरज से जगमगा उठी राम की ननिहाल, कलियुग में हुआ त्रेता सा आभास

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल पर चंदखुरी स्थित दुनिया के एकमात्र माता कौशल्या मंदिर में पहली बार जले 51 हजार दीये

रायपुर। नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं। कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।। अर्थात… माताएं अनेकों प्रकार से निछावरें करती हैं और हृदय से परम आनंद एवं हर्ष भरी हुईं हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपा के समुद्र और रणधीर श्री रघुवीर को आश्चर्य से एकटक देख रहीं हैं। …ये वह दृश्य है जब प्रभु श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद वापस अयोध्या आते हैं। माताएं जिस कौतुहल से देख रहीं होती हैं, ठीक वैसा ही कौतुहल गुस्र्वार को चंदखुरी में लोगों के चेहरों पर दिखाई दिया। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि प्रभु श्रीराम की ननिहाल में दीपावली के दिन कभी रोशनी का सूरज उतर आएगा। पूरे दिन धार्मिक आयोजन होंगे और चंदखुरी सहित राजधानी रायपुर और आसपास के जिलों से लोग आकर राम की भक्ति में इस तरह से डूबने का अवसर पा सकेंगे।

राजधानी रायपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित दुनिया के एकमात्र माता कौशल्या मंदिर का दृश्य गुस्र्वार को कुछ अलग ही था। ..अद्भुत, भक्ति में सराबोर, राम की लंका विजय का जश्न मनाने को आतुर। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल पर चंदखुरी में पहली बार दीपोत्सव का आयोजन किया गया। भव्य दीपोत्सव का। प्रभु श्रीराम की ननिहाल में स्थित माता कौशल्या के मंदिर परिसर में जब एक साथ 51 हजार दीयों से लौ उठी तो ऐसी छवि आंखों के सामने दिखाई दी, जो लोगों ने पहले कभी नहीं देखी थी। लालिमा युक्त दृश्य ऐसा लग रहा था मानो सूरज स्वयं प्रभु को लंका विजय की बधाई देने आया हो। आयोजन को विराट बनाने के लिए सीएम के निर्देश पर कार्यकर्ता चंदखुरी गांव के ग्रामीणों के साथ सुबह से ही जुट गए थे। खासकर महिलाओं ने दीया और बाती की तैयारी श्रद्धा के साथ सुबह से ही शुरू कर दी थी। रायपुर और आसपास के जिलों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने आयोजन में सहयोग किया और दीये सजाने से लेकर तेल डालने और उन्हें प्रकाश पुंज में परिवर्तित करने तक में सहयोग किया।

सुबह से जुट गए थे वालेंटियर
इसके पहले सुबह करीब सात बजे से ही राजीव मितान क्लब के सदस्यों ने ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर प्रांगण की साफ-सफाई की। इसके बाद प्रांगण को पानी से धो दिया। मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा मंदिर में लक्ष्मी पूजन किया गया। इसके बाद विशाल कन्या भोज और भंडारे का आयोजन किया गया। इस दौरान सुंदरकांड के पाठ के साथ-साथ राम भजन से चंदखुरी गूंजता रहा। कुल मिलाकर जिस दृश्य की कल्पना केवल अयोध्या में की जाती थी, वह अब चंदखुरी में दिखाई दे रहा था।
(TNS)