योग दिवस पर आसनों का पोस्टमार्टम, वरिष्ठ पत्रकार अनिल भास्कर ने की राजनीति में चलने वाले आसनों की चुटीली व्याख्या

तीरंदाज डेस्क। आज जहाँ सभी योग दिवस पर अपनी सुविधा के अनुसार विभिन्न आसान कर रहे हैं, वहीं देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार एक अलग ही नज़रिये से उन्हें देख रहे हैं। अनिल भास्कर जी बिना लाग लपेड़ के सीधी बात करने वाले संपादकों में शुमार हैं। बेबाक पत्रकारिता से सिस्टम की धूर्तता को सच का आईना दिखते रहे अनिल जी ने राजनीति में योग के इस्तेमाल का सटीक विवेचन किया है। आप भी पढ़िए और मज़े लीजिए।

अनिल जी लिखते हैं… योग शास्त्रों के अनुसार 84 लाख आसन हैं, जिनमें 84 को प्रमुख माना गया है। समझा जाता है कि इनमें से 32 ही आज व्यावहारिक तौर पर प्रसिद्ध हैं। अब देश के सात दशक का इतिहास पलटकर देखिये। मेरी तरह आप भी कहेंगे, राजनीति से बड़ा कोई योग नहीं। यह ऐसा योग है जिसकी गुरुता में सभी आसन समाहित हैं, चाहे वे पतंजलि प्रणीत हों या फिर अयंगर, रामदेव या ओशो।

ऐसे ही कुछ खास आसनों का उल्लेख यहाँ कर रह हूँ, जिन्हें पढ़ते हुए आसपास की राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र डालेंगे तो सोदाहरण समझने में आसानी होगी-

भुजंगासन- राजनीतिक लाभ के लिए प्रतिद्वंद्वी के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना
धनुरासन- पांव में जाँच एजेंसी के फंदे के बाद भी सत्ता पर प्रतिघात के लिए सिर उठाना
उत्कटासन- कुर्सी की आस में उकड़ूँ बैठे रहना
शवासन- सरकार के कामकाज में स्पष्ट दोष के बावजूद नेपथ्य में ख़ामोश लेटे रहना
पद्मासन- विरोधी दल के दफ़्तर के सामने धरने पर जमना
शीर्षासन- मूढ़ पार्टी नेता की चाटुकारिता में सिर के बल खड़े रहना
चक्रासन- टिकट दिलवाने की क्षमता रखने वाले नेता के चक्कर काटना
त्रिकोणासन- दो दलों से समानांतर सौदेबाज़ी करना
सूर्य नमस्कार- उगते यानी विजय की प्रबल संभावना वाले दल में विस्थापन (दल-बदल)
अनुलोम-विलोम – पहले आधारहीन/आपत्तिजनक टिप्पणी करना फिर माफी मांगना
आप सभी को योग दिवस की बधाई।